आत्ममंथन
रात को दूध लेने मदर डेयरी पहुंचा तो दूध खत्म हो चुका था थोड़ा जल्दी का अलार्म लगाया सोचा कल जल्दी नित्यकर्म निपटा कर दूध ले आऊंगा क्योंकि 9:00 बजे तक मरम्मत कार्य हेतु मिस्त्री को आना था, सुबह उठकर दूध ले आया और प्रभात का आनंद लेने छत पर पहुंचा नवरातों के सुंदर भोर शीतल पवन के झोंके शरीर और मन को आनंदित कर रहे थे इन दिनों में प्रकृति अपनी समान अवस्था में होती है ना गर्मी की तपन ना जाड़े की ठिठुरन ! इस सुबह में एक प्यारा अहसास था चारों ओर शांति ताजगी और पंछियों की चहचहाहट और अचानक ! एक चिड़िया मेरे छत की मुंडेर पर रखे पानी के कसोरे के पास आकर बैठ गई बड़ी उत्सुकता से कूदकर कसोरे पर चढ़ी पर शायद पानी ना होने के कारण इधर-उधर झांककर मेरी ओर आशा भरी निगाहों से देखा मानो पूछ रही हो इतना तो कर सकते हो हमारे लिए पानी तो मोल नहीं आता तुम भी तो इतना व्यर्थ करते हो|
घर पर मरम्मत के चलते पिछले दिन पानी डालना शायद भूल गया था नन्ही चिड़िया कि वह नजरें मुझे अपराधिक सा महसूस करा रही थी एक अजीब सा पश्चाताप मुझे झकझोर गया ! हम किसी को कुछ देने वाले कौन हैं देता तो ईश्वर ही है पर हमें निमित्त तो बनाया है उसने तो क्यों अपने कर्तव्य को ठीक से नहीं समझा, मेरा आज देर से उठना मुझे अपराध बोध का आभास करा रहा था, ना जाने कितने पंछी आकर लौट जाते होंगे भोर में क्योंकि वह हमारी तरह 7:00 बजे नहीं उठते पार्कों में कितने ही व्यक्ति चिड़ियों को दाना डालते हैं पर शायद किसी ज्योतिषी या पंडित के कहने पर या अपने ग्रह ठीक करने या पुण्य कमाने के लिए पर क्या किसी ने देखी होगी नन्ही चिड़िया की प्रश्नवाचक दृष्टि ??
जो हमसे कुछ अपेक्षाएँ रखती है|
~ सुबोध कुमार
रात को दूध लेने मदर डेयरी पहुंचा तो दूध खत्म हो चुका था थोड़ा जल्दी का अलार्म लगाया सोचा कल जल्दी नित्यकर्म निपटा कर दूध ले आऊंगा क्योंकि 9:00 बजे तक मरम्मत कार्य हेतु मिस्त्री को आना था, सुबह उठकर दूध ले आया और प्रभात का आनंद लेने छत पर पहुंचा नवरातों के सुंदर भोर शीतल पवन के झोंके शरीर और मन को आनंदित कर रहे थे इन दिनों में प्रकृति अपनी समान अवस्था में होती है ना गर्मी की तपन ना जाड़े की ठिठुरन ! इस सुबह में एक प्यारा अहसास था चारों ओर शांति ताजगी और पंछियों की चहचहाहट और अचानक ! एक चिड़िया मेरे छत की मुंडेर पर रखे पानी के कसोरे के पास आकर बैठ गई बड़ी उत्सुकता से कूदकर कसोरे पर चढ़ी पर शायद पानी ना होने के कारण इधर-उधर झांककर मेरी ओर आशा भरी निगाहों से देखा मानो पूछ रही हो इतना तो कर सकते हो हमारे लिए पानी तो मोल नहीं आता तुम भी तो इतना व्यर्थ करते हो|
घर पर मरम्मत के चलते पिछले दिन पानी डालना शायद भूल गया था नन्ही चिड़िया कि वह नजरें मुझे अपराधिक सा महसूस करा रही थी एक अजीब सा पश्चाताप मुझे झकझोर गया ! हम किसी को कुछ देने वाले कौन हैं देता तो ईश्वर ही है पर हमें निमित्त तो बनाया है उसने तो क्यों अपने कर्तव्य को ठीक से नहीं समझा, मेरा आज देर से उठना मुझे अपराध बोध का आभास करा रहा था, ना जाने कितने पंछी आकर लौट जाते होंगे भोर में क्योंकि वह हमारी तरह 7:00 बजे नहीं उठते पार्कों में कितने ही व्यक्ति चिड़ियों को दाना डालते हैं पर शायद किसी ज्योतिषी या पंडित के कहने पर या अपने ग्रह ठीक करने या पुण्य कमाने के लिए पर क्या किसी ने देखी होगी नन्ही चिड़िया की प्रश्नवाचक दृष्टि ??
जो हमसे कुछ अपेक्षाएँ रखती है|
~ सुबोध कुमार
Subodh kumar
Delhi
I m estate agent by profession
& writer by passion
Book writen- - मेरे मन के गांव में ( कविता संग्रह)



