विधा~चौपाई
समुद्र-वार्ता
गुरुचरणों में नमन हमारा|जग में गुरु है एक सहारा||
मात पिता गुरु तीनों देवा| करके सेवा पाओ मेवा||
भोरकाल आनंद समाना|टहलें मिल सब सहज सुजाना||
तुरत मित्र मंडली बुलाई|एक दिना यह बात चलाई||
सब मिल पहुँचे सागर तीरा| ऊँचा नीचा जल गंभीरा||
सागर तट पर आयें जायें|लहरें मन को बहुत लुभायें||
आसमान सूरज मुस्काते|धीरे-धीरे तपन बढ़ाते||
सूखे मुख ने माँगा पानी|प्यास हृदय की हुई सयानी||
सागर-जल कितना है खारा|समझ रहा सब हृदय हमारा ||
हे रत्नाकर उदधि शरीरा| खारे जल से मिटे न पीरा||
माना हृदय अथाह तुम्हारा|नमक दमक सह व्यर्थ किनारा||
जल के राजा हमें बताना|खारे जल का कौन ठिकाना||
नदियाँ नहरें कूप तड़ागा|मीठा जल सब आता भागा||
हमें बताओ कहाँ छुपाते|कैसे खुद की प्यास बुझाते||
शंख सीप सब जीव सहारे|सबने ही नित चरण पखारे||
कहो कौन इनका है दाता|दाता मम नहिं प्यास बुझाता||
सागर बोला बात सुनो तुम|बात सार को आज गुनो तुम||
जिस जल से तुम प्यास बुझाते|
वह जल कहो कहाँ से पाते||
मेघा छाते काले काले, भरतीं नदियाँ नहरें नाले||
पहले सूरज है झुलसाता |धीरे धीरे ताप बढ़ाता||
भाप बनाकर मम रस खींचा|खुद को आँसू से है सींचा||
तरह तरह के जहर मिले हैं|सब कुछ पीकर अधर सिले हैं||
मानव ने मल मूत्र बहाया|कृमि मारक विष खूब पिलाया||
माना मैंने मैं खारा हूँ|केवल मानव से हारा हूँ ||
भाप बना मैं ही बरसा हूँ|प्यासा केवल खुद तरसा हूँ||
नमक बना मम सूखा ढाँचा|स्वाद बढ़ा जिह्वा पर नाचा||
फिर भी मैं ही हूँ आरोपी|उछली जब तब मेरी टोपी||
जल की कीमत समझो भाई|जल बिन जीवन है दुखदाई||
जहर पिया अरु नमक बनाया|चख चख व्यंजन तुमने खाया||
मत नापो मेरी गहराई|जग है ईश्वर की प्रभुताई||
🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊🖊
दिलीप कुमार पाठक "सरस"
समुद्र-वार्ता
गुरुचरणों में नमन हमारा|जग में गुरु है एक सहारा||
मात पिता गुरु तीनों देवा| करके सेवा पाओ मेवा||
भोरकाल आनंद समाना|टहलें मिल सब सहज सुजाना||
तुरत मित्र मंडली बुलाई|एक दिना यह बात चलाई||
सब मिल पहुँचे सागर तीरा| ऊँचा नीचा जल गंभीरा||
सागर तट पर आयें जायें|लहरें मन को बहुत लुभायें||
आसमान सूरज मुस्काते|धीरे-धीरे तपन बढ़ाते||
सूखे मुख ने माँगा पानी|प्यास हृदय की हुई सयानी||
सागर-जल कितना है खारा|समझ रहा सब हृदय हमारा ||
हे रत्नाकर उदधि शरीरा| खारे जल से मिटे न पीरा||
माना हृदय अथाह तुम्हारा|नमक दमक सह व्यर्थ किनारा||
जल के राजा हमें बताना|खारे जल का कौन ठिकाना||
नदियाँ नहरें कूप तड़ागा|मीठा जल सब आता भागा||
हमें बताओ कहाँ छुपाते|कैसे खुद की प्यास बुझाते||
शंख सीप सब जीव सहारे|सबने ही नित चरण पखारे||
कहो कौन इनका है दाता|दाता मम नहिं प्यास बुझाता||
सागर बोला बात सुनो तुम|बात सार को आज गुनो तुम||
जिस जल से तुम प्यास बुझाते|
वह जल कहो कहाँ से पाते||
मेघा छाते काले काले, भरतीं नदियाँ नहरें नाले||
पहले सूरज है झुलसाता |धीरे धीरे ताप बढ़ाता||
भाप बनाकर मम रस खींचा|खुद को आँसू से है सींचा||
तरह तरह के जहर मिले हैं|सब कुछ पीकर अधर सिले हैं||
मानव ने मल मूत्र बहाया|कृमि मारक विष खूब पिलाया||
माना मैंने मैं खारा हूँ|केवल मानव से हारा हूँ ||
भाप बना मैं ही बरसा हूँ|प्यासा केवल खुद तरसा हूँ||
नमक बना मम सूखा ढाँचा|स्वाद बढ़ा जिह्वा पर नाचा||
फिर भी मैं ही हूँ आरोपी|उछली जब तब मेरी टोपी||
जल की कीमत समझो भाई|जल बिन जीवन है दुखदाई||
जहर पिया अरु नमक बनाया|चख चख व्यंजन तुमने खाया||
मत नापो मेरी गहराई|जग है ईश्वर की प्रभुताई||
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दिलीप कुमार पाठक "सरस"
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