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परिवर्तन
मुझे सत्य एव अहिंसा के ये दो रतन चाहिए.
हराभरा खुशनुमा सिर्फ मेरा ये वतन चाहिए.
मेरे जबान से निकले है मेरे जो लब्ज दो टूक,
है मालिक असत्य एव हिंसा का पतन चाहिए.
जिंदगी के हर हालात जिसने जीना सिकाया,
सिर्फ तो दाल चावल रोटी पकाने बर्तन चाहिए।
हसीन वादियों में बसा मेरा भारत देश महान,
हर भारत के वासियों के हातो से जतन चाहिए।
खयाल आता नही इस दौर में किसीका मुझे,
देशमे विकाससंग विचारोंका परिवर्तन चाहिए।
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✍ कवि-देवेंद्र चौधरी, तिरोडा
जिला-गोंदिया (महाराष्ट्र)
ता. 20/11/2019 को
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