विषय :- पाखण्ड
विधा :- कुण्डलिया
धरती पर पाखण्ड का , सजा हुआ बाजार ।
मानव फसते जा रहे , होकर के लाचार ।।
होकर के लाचार , सभी झांसे में आते ।
मलते हैं फिर हाथ , ठगा सा खुद को पाते।
कवि कहे एक बात , लालसा कभी न मरती ।
करता जो पाखण्ड , नष्ट कर देती धरती ।।
बनकर भूखे भेड़िये , पड़ते हैं सब टूट ।
धर्म-कर्म के नाम पर , मची पड़ी है लूट ।।
मची पड़ी है लूट , बहुत हैं यहाँ लुटेरे ।
मंदिर ,मस्जिद ,चर्च , डालते हैं सब डेरे ।।
झूठी चलते चाल , रहे सब सीना तनकर ।
रचते हैं पाखण्ड , लूटते साधु बनकर ।।
मानव नित पाखण्ड कर , रचते रहते स्वांग ।
लोगो को हैं फांसते , रखते अपनी मांग ।।
रखते अपनी मांग , करे हैं सब मन -मानी ।
धर साधु का वेश , फिरे हैं बनकर ज्ञानी ।।
कहुँ मैं मन की बात , बन रहा क्यों है दानव ।
अपनी सब पहचान , आज खोता क्यों मानव ।।
हरीश बिष्ट
रानीखेत ।। उत्तराखण्ड ।।
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