Wednesday, 4 December 2019

पाखण्ड (भुवन बिष्ट जी)

विषय :-  पाखण्ड
विधा :- कुण्डलिया

धरती पर पाखण्ड का , सजा हुआ बाजार ।
मानव फसते जा रहे ,  होकर  के  लाचार ।।
होकर  के  लाचार , सभी  झांसे  में  आते ।
मलते हैं फिर हाथ , ठगा  सा खुद  को पाते।
कवि कहे एक बात , लालसा कभी न मरती ।
करता  जो  पाखण्ड , नष्ट  कर देती  धरती ।।

बनकर भूखे भेड़िये , पड़ते  हैं  सब टूट ।
धर्म-कर्म के नाम पर , मची पड़ी है लूट ।।
मची  पड़ी  है लूट , बहुत  हैं  यहाँ लुटेरे ।
मंदिर ,मस्जिद ,चर्च , डालते हैं सब डेरे ।।
झूठी चलते चाल , रहे सब सीना तनकर ।
रचते  हैं  पाखण्ड , लूटते  साधु बनकर ।।

मानव नित पाखण्ड कर , रचते  रहते  स्वांग ।
लोगो  को  हैं  फांसते , रखते अपनी  मांग ।।
रखते अपनी  मांग , करे  हैं सब  मन -मानी ।
धर  साधु  का  वेश , फिरे  हैं  बनकर ज्ञानी ।।
कहुँ मैं  मन  की बात , बन रहा क्यों है दानव ।
अपनी सब पहचान , आज खोता क्यों मानव ।।

        हरीश बिष्ट
रानीखेत ।। उत्तराखण्ड ।।

No comments:

Post a Comment

शिव छन्द (राम - राम)

🍁🎊 शिव छंद 🎊🍁         चार चरण प्रति चरण ११ मात्राएं, ३,६,९, वीं मात्रा लघु | दो-दो चरण सम तुकांत , आवश्यकतानुसार गुरु को २ लघु में लिख स...